2345联盟安装系统,2345系统安装,2345联盟推广,2345系统下载,2345一键安装,2345联盟官网,2345系统重装,2345联盟注册,2345系统ISO,2345联盟赚钱,2345系统纯净版,2345联盟代理,2345系统安装教程,2345联盟任务,2345系统GHOST,2345联盟提现,2345系统激活,2345联盟作弊,2345系统兼容,2345联盟软件,2345系统优化,2345联盟平台,2345系统64位,2345联盟合作,2345系统安装包,2345联盟返利,2345系统正版,2345联盟推广方法,2345系统U盘安装,2345联盟佣金,2345系统驱动,2345联盟规则,2345系统PE安装,2345联盟账号,2345系统备份,2345联盟体验,2345系统安全,2345联盟教程,2345系统定制,2345联盟审核,2345系统更新,2345联盟收益,2345系统版本,2345联盟玩法,2345系统装机,2345联盟策略,2345系统镜像,2345联盟工具,2345系统硬盘安装,2345联盟评价,2345系统使用,2345联盟常见问题,2345系统修复,2345联盟经验,2345系统启动盘,2345联盟优缺点,2345系统卸载,2345联盟数据,2345系统破解,2345联盟合规,2345系统封装,2345联盟技巧,2345系统设置,2345联盟骗局,2345系统还原,2345联盟真实性,2345系统速度,2345联盟心得,2345系统内存,2345联盟流程,2345系统错误,2345联盟风险,2345系统蓝屏,2345联盟免责,2345系统安装失败,2345联盟客服,2345系统帮助,2345联盟反馈,2345系统推荐,2345联盟口碑,2345系统评测,2345联盟对比,2345系统性能,2345联盟总结,2345系统最新版,2345联盟2026,2345系统安装步骤,2345联盟SEO,2345系统关键词,2345联盟排名,2345系统搜索,2345联盟引流,2345系统优化技巧,2345联盟流量,2345系统装机量,2345联盟转化率,2345系统用户评价,2345联盟成功率,2345系统安装时长,2345联盟收益截图,2345系统兼容性,2345联盟操作,2345系统自动安装,2345联盟心得分享,2345系统静默安装,2345联盟实战,2345系统无人值守,2345联盟经验分享,2345系统快速安装,2345联盟教程大全,2345系统安装问题,2345联盟解决方案 后台管理
📢 欢迎访问系统之家!所有资源均经过安全检测。

प्रार्थना समाज: 1867 में स्थापना किसने की, ब्रह्म समाज से फर्क

发布时间:2026-09-17 | 浏览:1
📥 下载地址(文章开头)
电脑助手解决一切电脑问题。
प्रार्थना समाज (संस्कृत नाम, जिसका अर्थ है “प्रार्थना करने वालों की सभा”) एक ईश्वरवादी सुधार संस्था थी। इसकी पहली साप्ताहिक प्रार्थना सभा 31 मार्च 1867 को बंबई में हुई, और वह भी गिरगाँव में डॉक्टर आत्माराम पांडुरंग के घर पर। इसके सदस्य एक निराकार ईश्वर की उपासना करते थे और उन्होंने चार सूत्रों वाले एक सामाजिक कार्यक्रम की शपथ ली थी। जज महादेव गोविंद रानडे जैसे नेताओं के जरिए इन्हीं लोगों ने आगे चलकर पश्चिमी भारत की दो बड़ी सुधार संस्थाओं को खड़ा करने में हाथ बँटाया। ये थीं भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन और डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन। ज्यादातर पाठक प्रार्थना समाज को बंगाल के ब्रह्म समाज की बंबई शाखा मानकर याद कर लेते हैं। लेकिन यह उसकी शाखा नहीं था। 1864 में केशव चंद्र सेन की यात्रा ने इसके संस्थापकों को झकझोरा जरूर, पर समाज कभी कलकत्ता से जुड़ा नहीं। इसने अपने सदस्यों से कभी यह भी नहीं कहा कि वे जाति या परिवार के संस्कार छोड़ दें। इसकी भक्ति की जड़ें तुकाराम और नामदेव जैसे मराठी संत-कवियों में थीं। यह नोट साफ करता है कि प्रार्थना समाज की स्थापना किसने और कब की, और बंबई की बाद वाली सुधार संस्थाओं को ईमानदारी से इससे कितना जोड़ा जा सकता है। प्रार्थना समाज क्या था? प्रार्थना समाज एक स्वैच्छिक प्रार्थना सभा थी। यह न तो अपने अलग धर्मग्रंथ वाला कोई संप्रदाय था, न ही कानून से बनी कोई संस्था। यह बंबई के एक गुप्त, जाति तोड़ने वाले मंडल से निकला और 1867 में खुलकर सबके सामने आया। प्रार्थना समाज की स्थापना किसने और कब की? प्रार्थना समाज की स्थापना आत्माराम पांडुरंग ने की। इसकी साप्ताहिक प्रार्थना सभा 31 मार्च 1867 को उन्हीं के घर पर शुरू हुई, और वही इसके पहले अध्यक्ष बने। केशव चंद्र सेन ने संस्थापकों को प्रेरणा दी और महादेव गोविंद रानडे इसकी सबसे जानी-मानी आवाज बने। लेकिन इन दोनों में से किसी ने भी इसकी स्थापना नहीं की। प्रार्थना समाज के संस्थापक आत्माराम पांडुरंग ही थे। इससे पहले की परमहंस सभा समाज से पहले भी एक संस्था थी। आत्माराम के बड़े भाई दादोबा पांडुरंग ने परमहंस सभा बनाई थी, जिसे परमहंस मंडली भी लिखा जाता है। यह एक गुप्त सभा थी और इसका मुख्य मकसद जाति को तोड़ना था। हर नए सदस्य को शपथ लेनी होती थी कि वह जाति के भेद नहीं मानेगा। दीक्षा के समय वह किसी ईसाई की पकाई हुई रोटी खाता था और किसी मुसलमान के हाथ से पानी पीता था। कट्टरपंथियों के डर से बैठकें पूरी तरह गुप्त रखी जाती थीं। इसलिए यह चुनौती सदस्यों के अपने दायरे से बाहर कभी नहीं पहुँची। इसकी तारीख पर स्रोत एकमत नहीं हैं। NCERT की कक्षा VIII की किताब और IGNOU की इतिहास इकाई 1840 बताती हैं, जबकि शिवनाथ शास्त्री की किताब हिस्ट्री ऑफ द ब्रह्मो समाज (1912) 1849 बताती है। अंत पर सब सहमत हैं: 1860 तक यह सभा खत्म हो चुकी थी। 1864 की यात्रा से 1867 की स्थापना तक खुली संस्था बनने में तीन साल लगे, और बहुत-से सारांश इस पूरे क्रम को एक ही वाक्य में समेट देते हैं। ब्रह्म समाज के केशव चंद्र सेन ने 1864 में बंबई प्रेसीडेंसी का दौरा किया, और उनके भाषणों ने सुधार में लोगों की रुचि फिर से जगा दी। 1866 में परमहंस सभा के कुछ पुराने सदस्य आत्माराम पांडुरंग के घर मिले। उन्होंने एक ऐसी संस्था का प्रस्ताव रखा जो खुलेआम चार सुधारों की शपथ ले। खुली शपथ के इस विचार पर वे बँट गए, और कुछ लोग पीछे हट गए। जो लोग टिके रहे, उन्होंने तय किया कि समाज सुधार को एक धार्मिक आधार चाहिए। शास्त्री इस मोड़ का कुछ श्रेय शिक्षाविद वामन आबाजी मोडक की समझाइश को देते हैं। साप्ताहिक प्रार्थना सभा 31 मार्च 1867 को आत्माराम के घर शुरू हुई। करीब चार महीने बाद सदस्यों ने अपने आस्था-सूत्रों पर दस्तखत किए और एक प्रबंध समिति बनाई। इसके कुछ ही समय बाद केशव दूसरी बार बंबई आए। मुंबई महानगरपालिका का विरासत नोट केशव की यात्रा को 1867 में रखता है। लेकिन शास्त्री का ज्यादा पूरा ब्योरा दो यात्राएँ दिखाता है, एक स्थापना से पहले और दूसरी उसके बाद। तो रानडे की भूमिका क्या थी? वे शुरुआती वर्षों में समाज से जुड़े। शास्त्री मानते थे कि रानडे समाज के पहले सचिव थे, लेकिन महानगरपालिका का विरासत नोट बाल मंगेश वागले का नाम लेता है। IGNOU की इकाई 1867 के पुनर्गठन का श्रेय रानडे के मार्गदर्शन को देती है। सबसे सुरक्षित बात ब्रिटानिका वाली है: रानडे और संस्कृत के विद्वान आर. जी. भांडारकर इसके शुरुआती नेता थे, जबकि संस्थापक आत्माराम पांडुरंग थे। समाज की पहली बैठकें गिरगाँव की एक बर्फ फैक्ट्री के परिसर में बने एक कमरे में हुईं। यह फैक्ट्री दिवालिया होकर बंद हो चुकी थी। समाज ने अपने प्रार्थना भवन के लिए वही जमीन खरीदी, और हर सदस्य ने इसके लिए अपनी एक महीने की कमाई दी। ब्रह्म मिशनरी पी. सी. मजूमदार ने दिसंबर 1872 में इसकी नींव रखी, और मंदिर की प्रतिष्ठा अप्रैल 1874 में हुई (शास्त्री 24 अप्रैल की तारीख देते हैं, जबकि एक दूसरा ब्योरा 26 अप्रैल की)। प्रार्थना समाज किन बातों में विश्वास करता था? प्रार्थना समाज ईश्वरवाद (theism) सिखाता था, यानी एक ऐसे व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास जो प्रार्थना सुनता है। और यह इस विश्वास पर हिंदू भक्ति परंपरा के भीतर रहकर चलता था, उसके खिलाफ खड़े होकर नहीं। इसके पंथ को आप चार बिंदुओं में समझ सकते हैं: एक ईश्वर, बिना किसी रूप के। सदस्य शपथ लेते थे कि वे एक निराकार ईश्वर की उपासना करेंगे और सभी धर्मों में सच की तलाश करेंगे। कोई ग्रंथ अचूक नहीं। किसी भी किताब को ईश्वर का अचूक वचन नहीं माना जाता था, और किसी दूसरे संप्रदाय के पवित्र ग्रंथ का मजाक उड़ाने की मनाही थी। दूसरों की उपासना का सम्मान। प्रार्थना भवन में मूर्तियाँ नहीं रखी जाती थीं, लेकिन किसी भी संप्रदाय के पूज्य की निंदा नहीं करनी थी। एक से ज्यादा धर्मों के पाठ। NCERT बताता है कि इसकी सभाओं में हिंदू ग्रंथों के साथ-साथ बौद्ध और ईसाई ग्रंथों से भी पाठ होते थे। भक्ति वाले पक्ष की वजह से मराठी घरों को यह समाज अपना-सा लगता था। इसकी उपासना में सामूहिक भजन-गायन होता था, और इसकी भक्ति का मुख्य स्रोत वारकरी परंपरा थी। यह पंढरपुर में विठोबा (विट्ठल) तक जाने वाली तीर्थयात्रियों की राह है, और इसके संत-कवि, जैसे तुकाराम और नामदेव, संस्कृत की जगह मराठी में एक प्रेम करने वाले ईश्वर के गीत गाते थे। NCERT की किताब यह रिश्ता सीधे शब्दों में रखती है: समाज ने भक्ति की यह मान्यता बनाए रखी कि आध्यात्मिक रूप से सभी जातियाँ बराबर हैं। रानडे का तर्क: समाज संतों की ही एक शाखा इस रिश्ते का सबसे पूरा ब्योरा रानडे ने 1895 में दिया। मौका था बंबई के प्रार्थना मंदिर में वार्षिकोत्सव का भाषण, जिसका नाम था हिंदू प्रोटेस्टेंटिज्म । उन्होंने संतों की परंपरा को भागवत धर्म कहा, यानी प्रेम भरी भक्ति का धर्म। और समाज के आंदोलन को उन्होंने इसी का बस “एक धुँधला प्रतिबिंब और एक विनम्र शाखा” बताया। उन्होंने पूरे भक्ति आंदोलन को भारत का अपना प्रोटेस्टेंट सुधार आंदोलन माना। उनके हिसाब से यह एक ऐसा विरोध था जो पाँच या छह सदियों तक उन बहुत-सी बातों के खिलाफ चला, जिनसे बाद में यूरोप में लूथर के सुधारक लड़े। उन्होंने संतों के विरोधों की सूची दी, और हर विरोध समाज के किसी न किसी रुख से मेल खाता है: संस्कृत के एकाधिकार के खिलाफ। एकनाथ और तुकाराम ने धार्मिक ज्ञान को मराठी में सबके लिए खोल दिया, और इसके लिए पंडितों ने उनका विरोध किया। सिर्फ रस्म के लिए रस्म के खिलाफ। कर्मकांड का काम भक्ति में मदद करना था, उसकी जगह ले लेना नहीं। जाति की कठोरता के खिलाफ। महिपति की लिखी संत-जीवनियों के लगभग 100 संतों में रानडे ने करीब 10 महिलाएँ और उतने ही मुसलमान गिने, और बाकी संत ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों में लगभग बराबर बँटे थे। कई देवताओं के खिलाफ, लेकिन मूर्तियों के खिलाफ नहीं। संत एक ईश्वर को पूजते थे, लेकिन नानक और कबीर के पंथों को छोड़कर उन्होंने मूर्ति-पूजा पर हमला नहीं किया। यही आखिरी बात समझाती है कि समाज मूर्तियों के सवाल पर इतना सावधान क्यों था। अगर संतों ने कभी लोगों से अपनी मूर्तियाँ छोड़ने को नहीं कहा, तो उनकी विरासत का दावा करने वाली संस्था के पास भी ऐसी माँग करने का कोई खास आधार नहीं था। प्रार्थना समाज ब्रह्म समाज से कैसे अलग था? प्रार्थना समाज के लक्ष्य ब्रह्म समाज जैसे ही थे, लेकिन यह उससे जुड़ा नहीं था । और हिंदू रीति-रिवाजों से नाता तोड़ने में यह कहीं ज्यादा हिचकता था। ब्रिटानिका का सार एकदम सटीक है: बंबई की इस संस्था ने सदस्यों से कभी जाति या मूर्ति-पूजा छोड़ने की माँग नहीं की, और परिवार के पारंपरिक संस्कारों को भी नहीं छेड़ा। ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में कलकत्ता में हुई थी। रीति-रिवाजों से कितना नाता तोड़ा जाए, इसी सवाल पर वह दो बार टूटा। केशव का क्रांतिकारी गुट 1866 में अलग होकर भारतवर्षीय ब्रह्म समाज (Brahmo Samaj of India) बना। फिर 1878 में एक तीसरी संस्था, साधारण ब्रह्म समाज, सामने आई। बंबई इस टूट से बचा रहा। रानडे के संकलित निबंधों (1902) की भूमिका इसका श्रेय समाज के नेताओं को देती है कि “बंगाल की फूट बंबई में नहीं दोहराई गई”। यहाँ सदस्य अपने-अपने समुदायों के भीतर ही बने रहे। तो क्या ब्रह्म समाज के असर की वजह से इसे उसकी शाखा ही न मान लें? केशव की यात्राएँ और मजूमदार का रखा नींव का पत्थर असली रिश्ते थे। बिपन चंद्र की पुरानी NCERT किताब आधुनिक भारत भी समाज को “ब्रह्म समाज से गहराई से प्रभावित” बताती है। लेकिन असर का मतलब संबद्धता नहीं होता, और ब्रिटानिका साफ कहती है कि ऐसी कोई संबद्धता नहीं थी। प्रार्थना समाज ने कौन-से सामाजिक सुधार किए? प्रार्थना समाज ने उन चार सुधारों के लिए काम किया जो इसके संस्थापकों ने 1866 में आत्माराम पांडुरंग के घर हुई बैठक में तय किए थे: जाति-व्यवस्था की खुली निंदा; विधवा पुनर्विवाह की शुरुआत; स्त्री शिक्षा को बढ़ावा; बाल विवाह का खात्मा। NCERT की कक्षा VIII की किताब भी यही चार लक्ष्य गिनाती है। तारीखों वाले कुछ उदाहरण दिखाते हैं कि व्यवहार में इनका क्या मतलब था। विधवा पुनर्विवाह समाज का पहला सुधारवादी विवाह अगस्त 1870 में हुआ। समाज के एक सदस्य, वासुदेव बाबाजी नौरंगे, ने कृष्णाबाई नाम की एक युवा विधवा से ईश्वरवादी विधि से शादी की, और विवाह समाज के एक आचार्य ने कराया। कानून तो 1856 के हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम से ही ऐसे विवाहों की इजाजत दे चुका था। असली मुश्किल थी अपनी जाति का सामना करना। इसकी कीमत क्या होती थी, यह भांडारकर ने 1891 में दिखाया, जब उन्होंने रूढ़िवादियों के विरोध के बावजूद अपनी विधवा बेटी का पुनर्विवाह कराया। रात्रि पाठशालाएँ और स्त्री शिक्षा दिसंबर 1872 में सदस्यों ने उन युवा हमदर्दों के लिए एक थीइस्टिक एसोसिएशन (ईश्वरवादी संघ) बनाया, जो औपचारिक रूप से सदस्य बने बिना मदद करना चाहते थे। इसी संघ ने 1873 में मेहनतकश लोगों के लिए समाज की पहली रात्रि पाठशाला खोली। 1912 में शास्त्री की गिनती के हिसाब से पूरे बंबई में ऐसी आठ पाठशालाएँ थीं, जिनमें 300 से ज्यादा विद्यार्थी पढ़ते थे। इनमें ज्यादातर मिल मजदूर और दफ्तरों के चपरासी थे। इसी समूह ने 1873 में समाज का साप्ताहिक पत्र सुबोध पत्रिका भी शुरू किया। स्त्री शिक्षा घर से शुरू हुई, जहाँ रमाबाई रानडे जैसी, सदस्यों की पत्नियों को पढ़ाया गया। नवंबर 1882 में पंडिता रमाबाई की यात्रा के दौरान, उन्हीं के सुझाव पर, समाज की महिला सभा ने आर्य महिला समाज नाम अपनाया। पंढरपुर का अनाथालय 1876-77 के अकाल ने शोलापुर जिले में बहुत-से बच्चों को अनाथ कर दिया। तब पंढरपुर में जज के पद पर तैनात समाज के सदस्य लालशंकर उमियाशंकर ने एक अनाथालय के लिए लगभग 13,000 रुपये जुटाए। 1882 में बंबई समाज ने इसकी औपचारिक जिम्मेदारी ले ली। तीर्थयात्री विधवाएँ अपना गर्भ छिपाने के लिए पंढरपुर आती थीं, इसलिए यहाँ शिशु-हत्या रोकने के लिए एक संकटग्रस्त विधवा आश्रय (Distressed Widows’ Refuge) भी चलाया गया। बंबई के बाहर शाखाएँ कुछ ही सालों में समाज पूरी प्रेसीडेंसी में फैल गया: पूना: लगभग 1870 में स्थापना, मुख्य रूप से सी. एस. चिटनिस की कोशिशों से। अहमदाबाद: 1871 में स्थापना, और जज भोलानाथ साराभाई इसके पहले अध्यक्ष बने। दूसरे शहर: महानगरपालिका का विरासत नोट सूरत और कराची समेत कई दूसरी जगहों पर शाखाएँ दर्ज करता है। तेलुगु इलाका: कंदुकूरि वीरेशलिंगम (1848-1919) इस काम को दक्षिण तक ले गए। प्रार्थना समाज से आगे कौन-सी सुधार संस्थाएँ निकलीं? रिकॉर्ड के आधार पर बाद की दो संस्थाओं को समाज से जोड़ा जा सकता है: भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन (1887) और डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन (1906)। ब्रिटानिका कहती है कि इन दोनों को खड़ा करने में समाज के सदस्यों की अहम भूमिका थी। अक्सर इनके साथ एक तीसरी संस्था भी गिनाई जाती है, बंबई की विधवा-विवाह सभा। लेकिन वह समाज से निकली नहीं थी, बल्कि उससे पहले बन चुकी थी। 1865 की विधवा-विवाह सभा यहीं लोग सबसे ज्यादा उलटा समझ बैठते हैं। विष्णुशास्त्री पंडित ने 1865 में विधवा विवाह उत्तेजक मंडल (विधवा-विवाह को बढ़ावा देने वाली सभा) शुरू किया और खुद इसके सचिव रहे। यह समाज की पहली प्रार्थना सभा से दो साल पहले की बात है। रानडे इसके सदस्य थे। यह सभा उसी बंबई मंडली का हिस्सा है, लेकिन यह समाज की बहन जैसी है, उसकी शाखा नहीं। भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन रानडे ने 1887 में भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन की स्थापना की। इसकी बैठकें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सालाना अधिवेशन के साथ-साथ होती थीं। 1900 में सातारा के एक प्रांतीय सामाजिक सम्मेलन में उन्होंने इस जोड़ी का बचाव किया। उनका कहना था कि राजनीति और समाज सुधार अलग-अलग कर्तव्य नहीं हैं, क्योंकि “पूरे मनुष्य का विकास करना है और उसे पूर्ण बनाना है”। 1901 में रानडे की मृत्यु के बाद सम्मेलन के महासचिव का पद चंदावरकर के पास गया। रानडे से प्रेरणा पाने वाले गोपाल कृष्ण गोखले ने उनके सुधार के काम को आगे बढ़ाया। डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन सबसे साफ रेखा डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन तक जाती है। वी. आर. शिंदे ने मैनचेस्टर कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में ईश्वरवादी प्रचारक की ट्रेनिंग ली थी। वे 1903 में बंबई समाज के मिशनरी बने और इसकी रात्रि पाठशालाओं में धर्म पढ़ाने लगे। 18 अक्टूबर 1906 को उन्होंने परेल में ग्लोब मिल के पास मिशन का पहला स्कूल खोला। चंदावरकर मिशन के अध्यक्ष बने और शिंदे खुद इसके सचिव। शिंदे के अपने ब्योरे के मुताबिक समाज इससे पहले करीब 25 साल से बंबई के सबसे गरीब तबकों के लिए रात्रि पाठशालाएँ चला रहा था। मिशन एक अलग संस्था थी। लेकिन इसके संस्थापक और इसके पहले अध्यक्ष, दोनों समाज से आए थे, और रात्रि पाठशाला वाला इसका तरीका भी वहीं से आया। प्रार्थना समाज कहाँ चूक गया? इसकी मुख्य कमी खुद इसके सबसे बड़े विचारक ने बताई। 1895 के भाषण में रानडे ने माना कि आर्य समाज और ब्रह्म समाज की तरह प्रार्थना समाज भी “अभी तक राष्ट्र के दिल को नहीं छू पाया” है। इसका असर एक खास माहौल में पले-बढ़े गिने-चुने लोगों तक सीमित रहा। सदस्यों की बनावट से इसकी वजह समझ में आती है। विरासत नोट 1987 के एक सांख्यिकीय अध्ययन का हवाला देता है। उसके मुताबिक भारी बहुमत सदस्य महाराष्ट्र से थे, और उनमें से ज्यादातर अंग्रेजी पढ़े-लिखे चितपावन या सारस्वत ब्राह्मण थे। ऐसी संस्था जाति के खिलाफ उपदेश तो दे सकती थी। लेकिन वह निचली जातियों के बारे में ज्यादा बोलती थी, उनके बीच से कम। कथनी और करनी के फर्क पर भी आलोचना हुई। रानडे 1865 की विधवा-विवाह सभा के सदस्य थे। फिर भी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने किसी विधवा से शादी करने के बजाय 11 साल की रमाबाई से विवाह किया, और इस पर खूब हंगामा हुआ। विरासत नोट इसी घटना को उन सदस्यों के उदाहरण के रूप में रखता है जो अपनी ही कही बातों पर अमल करने में धीमे थे। जाति के सवाल पर दूसरे सुधारक और आगे गए। ज्योतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज बनाया, ताकि शूद्रों और दूसरी निचली जातियों को एकजुट किया जाए और ब्राह्मण वर्चस्व को सीधी चुनौती दी जाए। फुले के आंदोलन के बगल में रखकर देखिए, तो प्रार्थना समाज वैसा ही दिखता है जैसा वह असल में था: पढ़े-लिखे लोगों के बीच अंतरात्मा का सुधार, जो निचली जातियों तक ज्यादातर अपने स्कूलों के जरिए ही पहुँचा। क्या प्रार्थना समाज आज भी सक्रिय है? आज प्रार्थना समाज एक आंदोलन से ज्यादा एक विरासत और एक जगह के नाम के रूप में बचा है। यह हमेशा एक स्वैच्छिक संस्था था, कानून से बनी कोई संस्था नहीं। इसलिए इसके लिए कोई अधिनियम या आधिकारिक दर्जा खोजने की जरूरत नहीं है। चंदावरकर 1901 से 1923 में अपनी मृत्यु तक इसके अध्यक्ष रहे, और गजेटियर ऑफ बॉम्बे सिटी एंड आइलैंड (1909-10) दर्ज करता है कि इसके सदस्यों का गिरगाँव में अपना प्रार्थना-स्थल था। ब्रिटानिका समाज के इन कामों की सूची देती है: अध्ययन मंडल और मिशनरियों को सहायता; एक पत्रिका और मुफ्त पुस्तकालय; कामकाजी लोगों के लिए रात्रि पाठशालाएँ; महिलाओं और विद्यार्थियों के संगठन; सबसे ताजा आधिकारिक रिकॉर्ड बृहन्मुंबई महानगरपालिका का 2024 का विरासत नोट है, जो उसके D वार्ड के मुंबई लेगेसी प्रोजेक्ट का हिस्सा है। यह गिरगाँव में 1867 की स्थापना की कहानी दोहराता है और शाखाओं की सूची देता है। लेकिन यह भी कहता है कि मुंबई शाखा अब नहीं मिलती और इसके मुख्यालय की सही जगह का कोई पता नहीं है। नाम जरूर बचा रहा: आज के गिरगाँव में प्रार्थना समाज अब भी एक इलाके और एक बस स्टॉप का नाम है।
📥 下载地址(文章中间)
电脑助手解决一切电脑问题。
परमहंस सभा ने अपने गुप्त भोजों में शुद्धता के जिन नियमों को तोड़ा था, वे आज भी खबरों में आते हैं। सितंबर 2026 में एक दलित नेता की रैली के बाद हुए शुद्धिकरण अनुष्ठान पर विवाद हुआ, और आयोजकों ने कहा कि यह उनकी जाति को लेकर नहीं, उनकी टिप्पणियों को लेकर था। इस पर अस्पृश्यता और शुद्धता की धारणा वाले नोट में विस्तार से बात की गई है। परीक्षा के लिए प्रार्थना समाज कैसे पढ़ें प्रार्थना समाज GS पेपर I में आधुनिक भारतीय इतिहास के तहत आता है, 19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के हिस्से के रूप में। महिलाओं और जाति के सवाल के जरिए यह भारतीय समाज वाले हिस्से से भी जुड़ता है। इतिहास वैकल्पिक विषय के पेपर II में और राज्य परीक्षाओं में भी यह आता है, खासकर महाराष्ट्र की परीक्षा में। इसे उसी परिवार का एक अध्याय मानिए जिस पर भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन वाला नोट है। बुनियादी समझ के लिए NCERT की कक्षा VIII का अध्याय महिलाएँ, जाति और सुधार पढ़िए। मुख्य परीक्षा ने अकेले प्रार्थना समाज पर अब तक कोई प्रश्न नहीं पूछा है। वह सुधार आंदोलनों को एक समूह के रूप में पूछती है और बंबई के उदाहरणों को अच्छे अंक देती है। मुख्य परीक्षा 2021, GS पेपर I में पूछा गया: “ यंग बंगाल और ब्रह्म समाज के विशेष संदर्भ में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के उदय और विकास का पता लगाइए। ” फिर मुख्य परीक्षा 2019, GS पेपर I में पूछा गया: “ उन्नीसवीं सदी के ‘भारतीय पुनर्जागरण’ और राष्ट्रीय पहचान के उदय के बीच संबंधों का परीक्षण कीजिए। “ इतिहास वैकल्पिक विषय इसके और करीब आया है। 2024 के पेपर II में यह कथन दिया गया: “19वीं सदी के दौरान सामाजिक सुधार के एजेंडे की जगह धीरे-धीरे पुनरुत्थानवाद ने ले ली।” जो समाज अपने ही संतों के जरिए सुधार करता था, वह इस दावे को दोनों तरफ से परखने के लिए काम का सबूत है। प्रीलिम्स के लिए देखिए: Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 184 इतिहास से हैं, इसलिए संस्थापकों और तारीखों को पक्का कर लीजिए। दोहराने के लिए तथ्य: 31 मार्च 1867: गिरगाँव, बंबई में आत्माराम पांडुरंग के घर पहली साप्ताहिक प्रार्थना सभा। संस्थापक: आत्माराम पांडुरंग, पहले अध्यक्ष; केशव चंद्र सेन ने प्रेरणा दी, जो 1864 में आए और स्थापना के कुछ ही समय बाद दोबारा आए। पूर्ववर्ती संस्था: दादोबा पांडुरंग की गुप्त परमहंस सभा; NCERT और IGNOU के मुताबिक 1840, शास्त्री के मुताबिक 1849; 1860 तक खत्म। नेता: शुरुआत में महादेव गोविंद रानडे और आर. जी. भांडारकर; एन. जी. चंदावरकर 1901 से 1923 तक अध्यक्ष। चार सूत्री कार्यक्रम: जाति के बंधनों और बाल विवाह के खिलाफ; विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा के पक्ष में। भक्ति की जड़: मराठी भक्ति संत, जिनकी बात रानडे ने 1895 के अपने भाषण हिंदू प्रोटेस्टेंटिज्म में रखी। बाद की संस्थाएँ: 1887 का सामाजिक सम्मेलन (रानडे) और 18 अक्टूबर 1906 का डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन (वी. आर. शिंदे)। आम उलझनें, जिन्हें अलग-अलग रखना है: संस्थापक, प्रेरक, नेता। प्रार्थना समाज के संस्थापक आत्माराम पांडुरंग थे। केशव चंद्र सेन ने इसे प्रेरणा दी, और रानडे ने इसकी वैचारिक अगुवाई की। सभा और समाज। परमहंस सभा जाति तोड़ने वाला एक गुप्त मंडल थी, जो 1860 तक खत्म हो गई; समाज 1867 से एक खुली प्रार्थना संस्था था। पहले और बाद में। 1865 की विधवा-विवाह सभा समाज से पहले आई; सामाजिक सम्मेलन और डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन उसके बाद आए। बंबई का दूसरा समाज। शास्त्री दर्ज करते हैं कि 1874 में जब दयानंद सरस्वती ने बंबई में प्रचार किया, तो रानडे और उनके साथी उनके मिशन से मिल जाने के पक्ष में थे। लेकिन उनके 1875 में बनाए आर्य समाज ने वेदों को अचूक माना, जबकि प्रार्थना समाज का पंथ किसी भी ग्रंथ के बारे में ऐसा कहने से इनकार करता था। प्रार्थना समाज अपने आकार से कहीं ज्यादा अहम है। अगर आप यह समझा सकते हैं कि बंबई के सुधारकों ने हिंदू समाज से नाता तोड़ने के बजाय उसे उसके अपने संतों के जरिए बदलने का रास्ता क्यों चुना, तो आपके हाथ एक काम का ढाँचा आ जाता है। यह ढाँचा सुधार आंदोलनों के ज्यादातर प्रश्नों पर लागू होता है, महिलाओं के सवाल से लेकर राष्ट्रीय पहचान तक। पहले गिनी-चुनी तारीखें पक्की कीजिए, फिर अपना समय इसी तर्क पर लगाइए। बंबई के डॉक्टर आत्माराम पांडुरंग ने प्रार्थना समाज की स्थापना की और वे इसके पहले अध्यक्ष रहे। इसकी पहली साप्ताहिक प्रार्थना सभा 31 मार्च 1867 को उन्हीं के घर पर हुई। ब्रह्म समाज के केशव चंद्र सेन ने संस्थापकों को प्रेरणा दी। महादेव गोविंद रानडे और आर. जी. भांडारकर इसके सबसे जाने-माने शुरुआती नेता बने। प्रार्थना समाज की स्थापना 31 मार्च 1867 को बंबई (आज की मुंबई) में हुई, जब गिरगाँव में आत्माराम पांडुरंग के घर इसकी साप्ताहिक प्रार्थना सभा शुरू हुई। करीब चार महीने बाद सदस्यों ने अपने आस्था-सूत्रों पर दस्तखत किए। गिरगाँव में इसके अपने प्रार्थना भवन की प्रतिष्ठा अप्रैल 1874 में हुई। दोनों एक ईश्वर का उपदेश देते थे, लेकिन प्रार्थना समाज हिंदू रीति-रिवाजों के कहीं ज्यादा करीब रहा और कभी ब्रह्म समाज से जुड़ा नहीं। इसने सदस्यों से घर में जाति या मूर्ति-पूजा छोड़ने की माँग नहीं की, और इसकी भक्ति मराठी भक्ति संतों से आई। ब्रह्म समाज ने रीति-रिवाजों से ज्यादा तीखा नाता तोड़ा। वह 1866 और 1878 में टूटा, जबकि बंबई की संस्था ऐसी फूट से बची रही। प्रार्थना समाज ने चार सुधारों की शपथ ली थी। इसने जाति के बंधनों और बाल विवाह का विरोध किया, साथ ही विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा का समर्थन किया। व्यवहार में इसने 1873 से मजदूरों के लिए रात्रि पाठशालाएँ चलाईं। 1882 में इसने पंढरपुर में एक अनाथालय और विधवा आश्रय की जिम्मेदारी भी ले ली। महादेव गोविंद रानडे समाज के संस्थापक नहीं, बल्कि इसके प्रमुख विचारक थे। वे शुरुआती वर्षों में इससे जुड़े, और 1895 में हिंदू प्रोटेस्टेंटिज्म नाम के भाषण में उन्होंने इसके ईश्वरवाद को मराठी संतों से जोड़ा। उन्होंने 1887 में भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन की स्थापना भी की। हाँ, वे समाज के पहले सचिव थे या नहीं, इस पर स्रोत अलग-अलग बात कहते हैं। प्रार्थना समाज ने मराठी भक्ति संतों से प्रेरणा ली, खासकर वारकरी परंपरा के तुकाराम और नामदेव से। इसकी उपासना में सामूहिक भजन-गायन होता था, और रानडे ने समाज को संतों के भागवत धर्म की बस एक विनम्र शाखा कहा। इसने उनकी यह मान्यता भी बनाए रखी कि आध्यात्मिक रूप से सभी जातियाँ बराबर हैं। वी. आर. शिंदे ने अक्टूबर 1906 में बंबई में डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन की स्थापना की। वे 1903 से बंबई प्रार्थना समाज के मिशनरी थे। उस समय समाज के अध्यक्ष एन. जी. चंदावरकर मिशन के अध्यक्ष बने, और शिंदे इसके सचिव। इसका पहला स्कूल परेल में ग्लोब मिल के पास खुला। प्रार्थना समाज आज मुख्य रूप से एक विरासत और गिरगाँव की एक जगह के नाम के रूप में बचा है। मुंबई महानगरपालिका का 2024 का विरासत नोट इसकी स्थापना और शाखाओं को दर्ज करता है, लेकिन कहता है कि मुंबई शाखा और इसका मूल मुख्यालय अब नहीं मिलते। यह एक स्वैच्छिक संस्था थी, कानून से बनी संस्था कभी नहीं। 1. प्रार्थना समाज के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसकी पहली साप्ताहिक प्रार्थना सभा 1867 में बंबई में हुई थी। 2. इसने अपने सदस्यों के लिए जाति और मूर्ति-पूजा छोड़ना अनिवार्य किया था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (c) 1 और 2 दोनों (d) न तो 1 और न ही 2 उत्तर: (a) समाज की शुरुआत 31 मार्च 1867 को बंबई में हुई, लेकिन ब्रह्म समाज के क्रांतिकारी गुटों के उलट इसने सदस्यों से कभी जाति या मूर्ति-पूजा छोड़ने की माँग नहीं की। 2. प्रार्थना समाज ने अपनी भक्ति की प्रेरणा मुख्य रूप से किस परंपरा से ली? (a) महाराष्ट्र के वारकरी भक्ति संत (b) शंकराचार्य की अद्वैत शिक्षा (c) वैदिक अग्नि यज्ञ (d) चिश्ती सूफी सिलसिला उत्तर: (a) इसकी उपासना तुकाराम और नामदेव जैसे संत-कवियों पर टिकी थी, और रानडे ने समाज को उनके भागवत धर्म की एक शाखा कहा। 3. संस्था और उससे जुड़े व्यक्ति के निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन : वी. आर. शिंदे 2. भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन : महादेव गोविंद रानडे 3. परमहंस सभा : केशव चंद्र सेन। ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं? (b) केवल 1 और 2 (c) केवल 2 और 3 उत्तर: (b) शिंदे ने 1906 में मिशन की और रानडे ने 1887 में सम्मेलन की स्थापना की; परमहंस सभा बंबई में दादोबा पांडुरंग की गुप्त सभा थी। 4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. केशव चंद्र सेन ने प्रार्थना समाज की स्थापना की। 2. कंदुकूरि वीरेशलिंगम प्रार्थना समाज के काम को तेलुगु भाषी क्षेत्र तक ले गए। 3. एन. जी. चंदावरकर ने 1900 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता की। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3 (c) केवल 1 और 3 उत्तर: (b) केशव ने संस्थापकों को प्रेरणा दी, लेकिन समाज की स्थापना आत्माराम पांडुरंग ने की; कथन 2 और 3 सही हैं। 5. 1867 में प्रार्थना समाज की पहली साप्ताहिक प्रार्थना सभा बंबई में किसके घर पर हुई थी? (a) आत्माराम पांडुरंग (b) दादाभाई नौरोजी (c) गोपाल हरि देशमुख (d) ज्योतिराव फुले उत्तर: (a) यह सभा 31 मार्च 1867 को आत्माराम पांडुरंग के घर शुरू हुई, और वे समाज के पहले अध्यक्ष बने। मुख्य परीक्षा प्रश्न आधुनिक भारत में महिलाओं के प्रश्न 19वीं सदी के समाज सुधार आंदोलन के हिस्से के रूप में उठे। उस दौर में महिलाओं से जुड़े प्रमुख मुद्दे और बहसें क्या थीं? (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2017, GS पेपर I। प्रार्थना समाज ने हिंदू समाज से नाता तोड़ने के बजाय उसकी भक्ति परंपरा के भीतर रहकर सुधार करने का रास्ता चुना। परीक्षण कीजिए कि इस चुनाव ने इसकी पहुँच और इसकी सीमाओं, दोनों को कैसे आकार दिया। (15 अंक, 250 शब्द) पश्चिमी भारत में समाज सुधार में महादेव गोविंद रानडे के योगदान की चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) प्रार्थना समाज और बंबई में दलित वर्गों के लिए बाद में हुए प्रयासों के बीच के संबंधों का पता लगाइए। (10 अंक, 150 शब्द) 19वीं सदी के महाराष्ट्र में जाति के सवाल पर प्रतिक्रियाओं के रूप में प्रार्थना समाज और सत्यशोधक समाज की तुलना कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) Ashish Bharti Sir Ashish Bharti teaches Modern Indian History at Anantam IAS. He takes students from the Company's expansion through the national movement, keeping the phases, personalities and debates straight so Mains answers on the freedom struggle carry argument rather than a timeline. Continue reading भारत के किले: चार शास्त्रीय प्रकार, UNESCO की चार सूचियाँ और 27 प्रमुख किले 15 Sep 2026 · 1 min राज्य पुनर्गठन आयोग: धर आयोग, जेवीपी समिति, फजल अली आयोग और भाषाई राज्य 15 Sep 2026 · 1 min ट्रेड यूनियन आंदोलन: AITUC, INTUC, विभाजन और श्रम संहिताएं 15 Sep 2026 · 1 min रियासतों का एकीकरण: विलय पत्र, पूर्ण विलय और तीन मुश्किल मामले 15 Sep 2026 · 1 min सुगौली की संधि: आंग्ल-नेपाल युद्ध, छोड़े गए इलाके और काली नदी की सीमा 15 Sep 2026 · 1 min गैरिक मृदभांड संस्कृति: ताम्र निधि, सनौली की गाड़ियां और तिथियां 14 Sep 2026 · 1 min UPSC की तैयारी हिंदी माध्यम में — एक निशुल्क डेमो क्लास न कोई सेल्स कॉल, न कोई ब्रोशर। सोमवार सुबह की असली GS क्लास देखिए — हमारे अनुभवी शिक्षकों के साथ।
📥 下载地址(文章结尾)
电脑助手解决一切电脑问题。